Saturday, July 31, 2010

गुदगुदी है ख्यालो सी

गुदगुदी है ख्यालों सी
तमन्ना जैसे सालों की
झूमती ओस की बूंदों जैसी
खिलती गुलाबों की डाली सी

बरसती बातों जैसी वो
छा जाती रातों जैसी वो
चाँद जैसी उसकी अदाएं
नाजुक प्यारे नातों सी वो

चंचल वो बादल सी
आँखों में सजते काजल सी
है थोड़ी सयानी वो
और है थोड़ी पागल सी

धूप के जैसी हँसती वो
फूलों के जैसी लहती वो
नाचे पत्तों के जैसे
और हवा पे चलती वो

बातें उसकी गुड़ की डली
जाने किस मिटटी से बनी
होती अगर उदास वो
लगता सूरज डूबा अभी अभी

धनक(rainbow) के जैसी रंगों भरी
बिन पंखो सी कोई परी
ताजे ताजे खेत के जैसे
महके वो कादंबरी(female cuckoo)

रूठे तो इमली सी खट्टी
करती है पल में ही कट्टी
मनाने से न मनती वो
जैसे हो छोटी सी बच्ची

बिठा सामने तुझे यूँही
बस कुछ भी कहता रहूं
और तेरी प्यारी बातों को
बस यूँही सुनता रहूं

Thursday, July 29, 2010

तुम्ही हो भावों का स्रोत और रसधार तुम्ही हो

तुम्ही हो भावों का स्रोत और रसधार तुम्ही हो |

खिल उठा था मन ये मेरा, गीत तुम्हारे सुनकर
आँखें हो उठी थी जीवित, स्वप्न तुम्हारे बुनकर
निराशाओं के दलदल में जैसे तुमने हाथ थमाया
मेरी आशाओं की भागिनी और आधार तुम्ही हो
तुम्ही हो ………....

जिस गीत में बात तुम्हारी, राग वही जीवन का
जिस मोड पर घर तुम्हारा, प्रयाग वहीँ है मन का
हंसी तुम्हारी ही करती है, सात सुरों को पूरा
मोद का मेरे तुम गायन, हर्ष का नाद तुम्ही हो
तुम्ही हो ………

दिया है तुमने कितना फिर भी, बड़ी बहुत लालसा है
रिक्त हुआ दे देकर मैं भी, फिर भी कुछ खलता सा है
गीत मेरे असमर्थ है मेरे मन के भाव बताने में
जिन भावों की तुम आत्मा और आकार तुम्ही हो
तुम्ही हो ………………..

Friday, July 23, 2010

ठहरी हुई सी जिंदगी……

चलते चलते क्यूँ ये जिंदगी अब ठहर आई सी है……

हवाओं के सामने पीठ करके हूँ खड़ा मैं
डूबने के डर से आँखें मूँद कर हूँ खड़ा मैं
पैरों के नीचे है नाव चलती उछलती और ठहरती
छोड़ खुद को सहारे पे लहरों के खड़ा मैं
जिन लहरों के सहारे तैरती आई जिंदगी अब तक
क्यूँ साथ चलने में उनके, लगती अब कठिनाई सी है
चलते चलते क्यूँ …………….

जिंदगी के कई लम्हे हमने हंसकर थे बिताए
कुछ लम्हे पलकों पे रखके ख्वाब कल के थे सजाये
कुछ लम्हे नींदों से हमारी आँख मिचौली करते रहे हैं
और कुछ जागने पर, थे संग हमारे मुस्कुराए
आँखों में वो सरे लम्हे, बन जिंदगी अब भर आये हैं
ले पोटुओं(fingertips) पे जिनको हमने जिंदगी छिटकाई सी है
चलते चलते क्यूँ …………….
शोर में छिपी भीड़ की रुलाई और हंसी है
कानों को बेहाल करना शोर की एक बेबसी है
तन्हाई भी कहाँ रहने देती है मन को तन्हा
तन्हाई की हर घडी, यादों के शोर में लसी(drenched) है
शोर बहार है भीड़ का और तन्हाई का है अंदर
लगती तन्हाई के शोर से अच्छी, भीड़ की तन्हाई सी है.
चलते चलते क्यूँ …………….

Tuesday, July 13, 2010

सब बेकार की बातें हैं……..

(Word meanings : प्रतिभूति – guarantee; परमार्थ – doing good to others)

भला क्या है बुरा है क्या, सब बेकार की बातें हैं

स्वर्ग क्या है नर्क है क्या, कौन देख यहाँ पाया है
कौन है ऐसा जो मरकर वापिस लौट कर आया है
कौन पुण्य प्रतिभूति देता, किसी को स्वर्ग दिलाने की
किस पाप के करण कोई नर्क भोगकर आया है
स्वर्ग नर्क की परिभाषा, मुझे न अब बतलाओ तुम
ये सब तो टाट कमंडल लेकर फिरने वालो की बातें हैं
भला क्या है ……………….

कोई गिरा तो देख उसे, हंसकर खुश हुआ था मैं
मैं गिरा तो खिलखिलाकर, खूब हंसा था वह
ये एक दूसरे के ऊपर, हँसने का चक्र अनंत है
अपने न गिरने की खुशी में कैसे कोई चुप रहे
दुःख शोक प्रकट करने का, व्यवहार मुझे न अब सिखलाओ तुम
ये सब तो तथाकथित संवेदनशीलों की बातें हैं
भला क्या है………………….

किसी के लिए कुछ न किया, तो स्वार्थी जग ने नाम धरा
किसी को जब सब दे बैठा, तो ढोंगी  इसने मुझे कहा
जिसके नाम किया था सब कुछ, कहे वो भी दीवाना मुझे
इस स्वार्थ परमार्थ के चक्कर में जाने मैंने क्या क्या न सहा
दान धर्म और मानवता के, किस्से न अब सुनाओ मुझे
ये सब देवों की हैं, कहाँ मानव के लिए ये बातें हैं
भला क्या है……….

Friday, July 2, 2010

Dump Modi, what an idea SirJi

First Patnaik and then Nitish, the BJP stands almost alienated after most of its allies have preferred to get parted from NDA. The NDA, which was a coalition of almost 27 parties during 13th LokSabha, has reduced to a membership of only 13 parties. In that too the major regional force is only one – Nitish Kumar’s JD(U). BJP was one of the fastest growing party from 1980 to 1998 elections. What happened to the party and are there any chances for its revival?

Bhartiya Jan Sangh was rechristened as Bhartiya Janta Party in a bid to gain new political grounds. The new BJP chose to build its base on three issues as its foundation pillars, unnecessary to be mentioned all were based on Hindutva and Divisive politics. The three issues were Uniform Civil Code(UCC), Ram Mandir and art 370 of the constitution which is related to autonomy of the Jammu and Kashmir state. All issues were framed in a manner that Hindus felt that they were being discriminated.

UCC is nothing but unification of secular laws of a religion like Marriage, adoption, inheritance etc. By Secular laws we mean something which does not form core part of a religion and are more tradition based. Hindus have got a more modern secular law framework in the country but because of opposition of Muslim fundamentalists the government have not been able to do the same for Muslims in the country. But it does not mean that Hindus are being discriminated. The issue was presented in this way by BJP that now its almost impossible to bring UCC which is also one of our constitutional goals enshrined in Directive Principles of State Policy.

Ram Mandir was the corner stone of BJP’s divisive politics. It acted as a fuel in the not so communalised emotions in 1990’s. The home grown Jihadists are direct products of the incident which happened on 6th Dec 1992.

Art 370 was kind of a negotiation between the people of Kashmir and Government of India when Kashmir agreed to join Union of India. Over the time most of the provisions almost stand ineffective because of the multiple restrictions and practically J&K has hardly any automny. But the issue is politicised now buddy, so obviously it can never be resolved.

Coming back to the BJP crisis, BJP based upon those agendas came to power in 1998. But now it was impossible to implement what it has desired for so long. Soon it lost its base and the India Shinned but not the BJP. After Gujrat Pogrom and Orissa killings, most of the allies preferred to walk away. BJP was back to its hindutva agenda after loss in 2004 elections, but it realised after 2009 elections that its not possible to befool people for long. Since then its been trying to change its image. The first step was to reap in Gadkari as president. And there are speeches regarding the development etc. But people know still the roots lie deep down the land of communalism which is a quagmire for BJP. If BJP really wants to convince people that it has changed and it could pose a serious alternative to Congress regime, it would have to fire Modi and Varun Gandhi.

Though Modi is also the modern face of BJP and has brought prosperity in Gujrat but the fact remains that even if you are God, you cannot kill people just because they don’t belong to your religion. Getting rid of him is a bit risky task and BJP might become Dhobi Ka Kutta, but that will not make any difference as the demise has already heralded. The firing of communal elements might give BJP a chance to have a peaceful demise or might act as a shot in the arm.

मेरी मधुशाला

हाला = vine; मधुशाला = bar /  tavern ;साकी = bargirl (though it looks derogatory but cdn’t find a better word in english, literal persian meaning is cupbearer)

सुबह मोहिनी अरुण(color of rising sun) है मुख सी, रात का रंग केशो सा काला
इन्द्रधनुष में हंसी तुम्हारी, गुलाबों में रंग अधरों(lips) वाला
ये आदि अनादी प्रकृति सारी, ऋणी तुम्हारी लगती है
नीरस जग को रुचिकर करती, तुम्हारी रंगकोष सी मधुशाला

युगों युगों से नदियों ने सागर को दिया मृदु जल हाला
फिर भी सागर किंचित ना बदला, रहा वह खारा का खारा
मेरे ह्रदय सागर की प्रिये पर, सारी कड़वाहट घुल जावेगी
एक बूँद का दान भी दे दे, यदि तुम्हारी मधुशाला

कब तक मैं खड़ा रहूँगा लेकर ऐसे ही प्याला
कब तक तुम लाओगी बार बार भरकर प्याला
ए साकी तोड़ दो बंधन आज हर प्याले हाला का
बन जाओ सखी मेरी कर दो नाम मेरे ये मधुशाला
 
सूखे छिटके मन सा फिरा मैं दर दर लेकर प्याला
देखे मदिरालय अनेक चखी तरह तरह की हाला
न प्यास बुझी न कोई भी बूँद असर कर पाई मुझ पर
तृप्ति मिली बस तेरी चौखट पर, धन्य हो तेरी मधुशाला
 
रूप सौंदर्य के चक्कर में कितनों ने जीवन जला डाला
बर्बाद हो गया वह पड़ा प्रेम से जिस जिसका पाला
कहने वाले कहते हैं यम बसते तेरे मदिरालय में
आकर तो देखे कोई तुझे औ’ स्वर्ग सी तेरी मधुशाला
 
आँखें तेरी सजी हुई हैं बनकर के साकी बाला
प्रतीक्षा ज्यूँ कर रही हो अधरों में भरकर हाला
बूँद बूँद होठो से प्रिये क्यूँ व्यर्थ मधु गिराती हो
सावन सी बरसो मुझ पर खाली करदो अपनी मधुशाला
 
मंदिर में भगवान मिले और मस्जिद में अल्लाह ताला
मंदिर मस्जिद में जाने पर, पर ध्यान कहाँ लगने वाला
चंचल चितवन प्रिये तुम्हारा ध्यान योग्य ऐसा है कुछ
धूनी(meditation) रमा बैठा हूँ अब पीने को तुम्हारी मदिर हाला
 
दूर लक्ष्य है कितना अभी सोचे पथ पर चलने वाला
ताप खींचे प्राण उसके, आस में सूखा उसका प्याला
मेरे लिए तो अहो प्रिये, पर्याप्त ध्यान तुम्हारा है
तुमसे मिलने की आशा ही, बन जाती है अमृत हाला
 
सुबह जागते ही सूरज ने, पहनाई तुम्हे रश्मि(Sunrays) माला
सिमट गई धूप यूँ मुख पर, जैसे प्याले में हाला
आँखों से अपनी प्रिये इस दृश्य को कैसे न पियूं
कहाँ मिलेगा इन्हें मधु ऐसा, कहाँ मिलेगी ऐसी मधुशाला.
 
ना सोचो तुम ही एक पिलाने वाली, अद्वितीय साकी बाला
न सोचो बिना तुम्हारे, कोई न भर पायेगा प्याला
प्रिये मेरे मदिरालय में आकर तो देखो तुम कभी
प्रेम मधुर है मदिरा मेरी, हृदय है मेरा मधुशाला
 
किस कुशल शिल्पकार ने तुम्हे, इस सुन्दर सांचे में ढाला
हो संतुष्ट कुशल कृति से फिर, भर दी प्राणों की हाला
तुम जैसी रचना वह कभी न कर पाया होगा फिर
लगता है तुम पर ही उसने खाली कर दी अपनी मधुशाला
 
आखें नशीली हैं इतनी ज्यूँ देवलोक की हो हाला
हिरणी सी चंचल हैं फिर भी ओढ़े हैं हया की दुशाला
देखकर जब मन मेरा  कह पियो पियो ललचाता है
बनता है साकी काजल तुम्हारा, नयन बनते हैं मधुशाला

कभी कभी क्यूँ लगता है तुम मिथ्या(illusion) हो साकी बाला
न ही विश्वसनीय हो तुम तुम न ही तुम्हारी मृदु हाला
मोहपाश में बांध सभी को तुम स्वप्न सुखी दिखलाती हो
वो स्वप्न सभी हैं एक भरम, है भरम तुम्हारी मधुशाला

जान कर भी सब मैंने, खुद को भरम में नित डाला
जान कर भी तुझको हरजाई, सारा प्यार न्यौछावर कर डाला
जन कर भी सब कुछ मैंने सच्चाई नशे में है मानी
माना सब कुछ एक भरम, मानी बस एक सच्ची मधुशाला

भूल जाऊं तेरा सब कुछ, हर यत्न मैंने कर डाला
भूल जाऊं हर प्रसंग तेरा एक स्वप्न समझकर काला
पर हर घूँट के साथ सभी घाव हरे हो जाते हैं
न हर पाती दुःख मेरा, जग दुःख हरिणी मधुशाला

विष जैसा लगता है अब सौंदर्य जो कभी था हाला
कड़वाहट भर गई है मन में, जो पिया सच्चाई का प्याला
अच्चा था वह झूंठ ही जिसमें, नाचा करते थे सब संग मेरे
अब रोता हूँ मैं फूट फूट, खड़ी मूक देखती मधुशाला

कल तक थी जो कादंबरी(female cuckoo), अब करती है कानो में छाला
बातें उसकी झूंठी सारी, चुभती हैं हृदय में बन भाला
चींखें अपनी और किसी को सुनने देता नहीं हूँ मैं
एक साकी के घात के कारण क्यूँ बदनाम हो मधुशाला

पड़ा पड़ा अकेला कबसे, प्रतीक्षा करता है प्याला
ना अब तक है साकी आया, ना कोई पीने वाला
कल तक जहाँ बैठ सभी, पियो पियो चिल्लाते थे
भांय भांय अब करती है श्मशान बनी है मधुशाला

बहुत खुश हुआ जब कोई, उठाया उसने कर में प्याला
दुःख में डूबा जब वह, तब भी साथ था वही प्याला
मानव ही दुःख में हाथ पकड़, सुख में छोड़ा करते हैं
साथ बैठ हर खुशी मनाती, हर दुःख बांटती मधुशाला

मृदु  भावों के अंगूरों की जो बना लाया था हाला
प्रेरित हो जिससे में, जीता जीवन की मधुशाला
मधु, हाला, प्याला, साकी को जिसने नयी परिभाषा दी
उन ‘बच्चन’ के चरणों में अर्पित ये मेरी मधुशाला