Friday, July 23, 2010

ठहरी हुई सी जिंदगी……

चलते चलते क्यूँ ये जिंदगी अब ठहर आई सी है……

हवाओं के सामने पीठ करके हूँ खड़ा मैं
डूबने के डर से आँखें मूँद कर हूँ खड़ा मैं
पैरों के नीचे है नाव चलती उछलती और ठहरती
छोड़ खुद को सहारे पे लहरों के खड़ा मैं
जिन लहरों के सहारे तैरती आई जिंदगी अब तक
क्यूँ साथ चलने में उनके, लगती अब कठिनाई सी है
चलते चलते क्यूँ …………….

जिंदगी के कई लम्हे हमने हंसकर थे बिताए
कुछ लम्हे पलकों पे रखके ख्वाब कल के थे सजाये
कुछ लम्हे नींदों से हमारी आँख मिचौली करते रहे हैं
और कुछ जागने पर, थे संग हमारे मुस्कुराए
आँखों में वो सरे लम्हे, बन जिंदगी अब भर आये हैं
ले पोटुओं(fingertips) पे जिनको हमने जिंदगी छिटकाई सी है
चलते चलते क्यूँ …………….
शोर में छिपी भीड़ की रुलाई और हंसी है
कानों को बेहाल करना शोर की एक बेबसी है
तन्हाई भी कहाँ रहने देती है मन को तन्हा
तन्हाई की हर घडी, यादों के शोर में लसी(drenched) है
शोर बहार है भीड़ का और तन्हाई का है अंदर
लगती तन्हाई के शोर से अच्छी, भीड़ की तन्हाई सी है.
चलते चलते क्यूँ …………….

2 comments:

  1. ज़िंदगी का फलसफा बहुत खूबसूरती से लिखा है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणी देने वालों को सरलता होगी ...

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  2. धन्यवाद. वर्ड वेरिफिकेशन हटा लिया है.

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