Thursday, July 29, 2010

तुम्ही हो भावों का स्रोत और रसधार तुम्ही हो

तुम्ही हो भावों का स्रोत और रसधार तुम्ही हो |

खिल उठा था मन ये मेरा, गीत तुम्हारे सुनकर
आँखें हो उठी थी जीवित, स्वप्न तुम्हारे बुनकर
निराशाओं के दलदल में जैसे तुमने हाथ थमाया
मेरी आशाओं की भागिनी और आधार तुम्ही हो
तुम्ही हो ………....

जिस गीत में बात तुम्हारी, राग वही जीवन का
जिस मोड पर घर तुम्हारा, प्रयाग वहीँ है मन का
हंसी तुम्हारी ही करती है, सात सुरों को पूरा
मोद का मेरे तुम गायन, हर्ष का नाद तुम्ही हो
तुम्ही हो ………

दिया है तुमने कितना फिर भी, बड़ी बहुत लालसा है
रिक्त हुआ दे देकर मैं भी, फिर भी कुछ खलता सा है
गीत मेरे असमर्थ है मेरे मन के भाव बताने में
जिन भावों की तुम आत्मा और आकार तुम्ही हो
तुम्ही हो ………………..

3 comments:

  1. its too complicated though... bt i really appreciated ur effort...
    u r our generation ram dhari singh dinkar

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  2. Looks like he is the only poet you know of :)

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  3. तुम्ही हो भावों का स्रोत और रसधार तुम्ही हो |
    perfect....

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