Thursday, August 5, 2010

आशा और निराशा

देख पाता हूँ जहाँ तक, अंधकार लहराता है

देखने को प्रकाश यहाँ, मन तरस सा जाता है

छोटे छोटे दिये कई, लगे हैं तूफानों से लड़ने में

पर प्रभंजनो(cyclones) के समक्ष, उनका दम टूट सा जाता है

 

मन को है विश्वास यही, उस  पार किरण कोई होगी

अंधेरो को दूर करने में, जो स्यात(perhaps) सक्षम होगी

पर कैसे सम्भालूँ नाव को अपनी, मैं इस तम(darkness) के सागर में

सागर अनंत है, नाव बड़ी, पतवार मेरी पर छोटी

 

कभी बीज बोया मेरा, धरती में ही मर जाता है

कभी खड़ी फसल में, घुन कोई लग जाता है

वैशाखी मनाये हुए जैसे, मुझको बरसों बीत गए

हर वैशाखी को मुझको अपना श्राध मनाना पड़ता है

 

उड़ना भी न सिखा था उसने, जब व्याध(hunter) ने पर काट दिए

ना छूट भागे चंगुल से, यह सोच पैर भी बांध दिए

आस धरोहर छोड़ी खग(bird) ने, आने वाली पीढ़ी को

पर आस ना छोड़ी उसने, चाहे प्राण भी त्याग दिए

 

यह संघर्ष सत्य है, शाश्वत(continuous) है,  ज्ञात है इतना मुझको

जलते रहना है अंत तक, पड़े सहना ही कितना मुझको

धरोहर आस की मुझको, जो मेरे पूर्वज छोड़ गए

बना सत्य उस आस को, देनी है धरोहर भी मुझको

बना सत्य उस आस को, देनी है धरोहर भी मुझको

3 comments:

  1. Its great...... and aapki hindi sach mein bahut achi hai... kya kehte hai kabile tarif....... u hav great thoughts n ability to pen it down.

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