Monday, September 27, 2010

सिलसिले

 

कुछ किरदार मिले थे फिर से

शुरू एक कहानी करने को

बेरंग सी अपनी दुनिया में

कुछ रंग नए भरने को

 

किरदार मिले, मिलकर हँसे

हँसते हँसते सबने कहा

लो जुड गया अब हम सबसे

खुशिओं का एक और सिलसिला

 

वक्त यूँ ही बीतता रहा

हंसी में, ठहाकों में

गुम हो गई तन्हाई कहीं

बेवजह सी गूंजती आवाजों में

 

भूल गए किरदार सभी

किरदार हैं वे सिर्फ यहाँ

अफ़साने लिखने वाला

उनकी परवाह करता कहाँ

 

फिर हुआ वो ही

जो जानते थे सभी एक दिन होना होगा,

शुरू हुआ जो सिलसिला

एक रोज खत्म होना होगा

 

फिर भी जब वो

बेदर्द सी घडी आयी

आँखें बनी पत्ते शबनमी

पर बूँद न कोई गिरने पायी

 

फीकी सी मुस्कान लिए

बोले सभी

चलो कुछ अच्छा ही होगा,

पर मन में सब सोच रहे थे

लो खत्म हुआ एक और सिलसिला

जाने कब नया शुरू होगा

जाने कब नया शुरू होगा…….

Tuesday, September 14, 2010

बातें

बातें तुम से करते करते, बातों की हद हो गई

मीठी तेरी बातें इतनी, कि रात शहद हो गई

 

ख़ामोशी चुपके से जाके, कोने में कहीं सो गई

बातों में तेरी मेरी वो, डूबी ऐसी कि खो गई

तेरी हंसी के धागों से बनाए हुए लिबास में

बातें सजी ऐसी कुछ कि झलक चाँद की हो गई

 

क्या खूब सिलसिला था वो, रुकने कि कवायद(problem) हो गई

वक्त देखने को थमा ऐसा, उसकी खुद से जहद हो गई.

बातें तुम से करते करते, बातों की हद हो गई

मीठी तेरी बातें इतनी, कि रात शहद हो गई

 

बातें मन पे छाई ऐसी कि बातें फलक(sky) हो गई

मासूमियत से महकी ऐसी कि खुद महक हो गई

बातें तेरी झूमी ऐसी कि बातें छनक हो गई

रंगों से तेरे खिली ऐसी कि बातें धनक हो गई

 

हाथ थामकर तेरा जो चले, ख्यालों कि सरहद खो गई

चलते चलते जाने कब रात बीती, कब सहर(dawn) हो गई

बातें तुम से करते करते, बातों की हद हो गई

मीठी तेरी बातें इतनी, कि रात शहद हो गई

Wednesday, September 8, 2010

यादें

बिछा रखी हैं पलकें हमने

आज भी उन राहों पे

जिन पर हंसते हंसते चल कर

तुम मिलने आया करती थी

 

आज भी हम उस पेड के नीचे

जगह रोक कर बैठे हैं

जहाँ बैठ कर तुम अपने

बालों में हाथ घुमाया करती थी

 

वहाँ पे हंसते देख किसी को

दिल मेरा भर जाता है

जहाँ बैठकर तुम मन पर मेरे

हंसी उकेरा करती थी

 

सुनते सुनते बात तुम्हारी

जब कुछ कहने को मैं मुडता हूँ

देख अजनबियों को चारो ओर

मन पर ख़ामोशी सी छा जाती है

 

मानने को मन मेरा

होता नहीं तैयार ये

तुम नहीं हो वहाँ पर

जहाँ तुम रोज हुआ करती थी

 

काश कि होती कोई eraser

मिटा सके जो यादो को

क्योंकि संग तेरी यादों के

अब जीना लगता easy नहीं

Friday, September 3, 2010

ऐसा क्यूँ होता है

[A flashback to childhood thoughts………]

बाद  में रटवाना बाकी सब कुछ

पहले बताओ एक बात

तीन के बाद आता क्यूँ चार है

क्यूँ आता नहीं है पांच?

तीन तीन जुडकर क्यूँ बनते हैं छ

क्यूँ बनते नहीं हैं नौ?

दस मैं एक और सौ में दो

जीरो आती हैं क्यों?

 

सूरज दिन मैं उगता है

तो रात को कहाँ छुप जाता है?

देता है इतनी रोशनी जो

तो तेल कहाँ से लाता है?

 

लगता है, है चाँद गरीब

बेचारा दाग नहीं धो पाता है

डरता है सूरज से शायद

जो उसके जाने पर ही आता है

 

चलती है इतनी अच्छी हवा जो,

तो पंखे क्यूँ नहीं दिखते हैं?

बारिश करने को बादल में

बोलो पानी कैसे भरते हैं?

 

धरती अगर गोल है तो

मैं इस पर खड़ा हूँ कैसे?

अगर घूमती है ये तो बोलो

मैं थमा हुआ हूँ कैसे?

 

कभी सोचता हूँ शायद

मैं पंछी जैसा उड़ पाता

उड़कर शायद दूर से मैं

समझ सभी यह पाता