Friday, September 3, 2010

ऐसा क्यूँ होता है

[A flashback to childhood thoughts………]

बाद  में रटवाना बाकी सब कुछ

पहले बताओ एक बात

तीन के बाद आता क्यूँ चार है

क्यूँ आता नहीं है पांच?

तीन तीन जुडकर क्यूँ बनते हैं छ

क्यूँ बनते नहीं हैं नौ?

दस मैं एक और सौ में दो

जीरो आती हैं क्यों?

 

सूरज दिन मैं उगता है

तो रात को कहाँ छुप जाता है?

देता है इतनी रोशनी जो

तो तेल कहाँ से लाता है?

 

लगता है, है चाँद गरीब

बेचारा दाग नहीं धो पाता है

डरता है सूरज से शायद

जो उसके जाने पर ही आता है

 

चलती है इतनी अच्छी हवा जो,

तो पंखे क्यूँ नहीं दिखते हैं?

बारिश करने को बादल में

बोलो पानी कैसे भरते हैं?

 

धरती अगर गोल है तो

मैं इस पर खड़ा हूँ कैसे?

अगर घूमती है ये तो बोलो

मैं थमा हुआ हूँ कैसे?

 

कभी सोचता हूँ शायद

मैं पंछी जैसा उड़ पाता

उड़कर शायद दूर से मैं

समझ सभी यह पाता

4 comments:

  1. धरती अगर गोल है तो

    मैं इस पर खड़ा हूँ कैसे?

    अगर घूमती है ये तो बोलो

    मैं थमा हुआ हूँ कैसे?
    अति सुन्दर मन भावन रचना है
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया

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  2. it is very interesting, Abhishek!

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  3. It is very interesting, Abhishek!

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  4. Thanks, Surendra, Thanks Rachana.......

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