Monday, September 27, 2010

सिलसिले

 

कुछ किरदार मिले थे फिर से

शुरू एक कहानी करने को

बेरंग सी अपनी दुनिया में

कुछ रंग नए भरने को

 

किरदार मिले, मिलकर हँसे

हँसते हँसते सबने कहा

लो जुड गया अब हम सबसे

खुशिओं का एक और सिलसिला

 

वक्त यूँ ही बीतता रहा

हंसी में, ठहाकों में

गुम हो गई तन्हाई कहीं

बेवजह सी गूंजती आवाजों में

 

भूल गए किरदार सभी

किरदार हैं वे सिर्फ यहाँ

अफ़साने लिखने वाला

उनकी परवाह करता कहाँ

 

फिर हुआ वो ही

जो जानते थे सभी एक दिन होना होगा,

शुरू हुआ जो सिलसिला

एक रोज खत्म होना होगा

 

फिर भी जब वो

बेदर्द सी घडी आयी

आँखें बनी पत्ते शबनमी

पर बूँद न कोई गिरने पायी

 

फीकी सी मुस्कान लिए

बोले सभी

चलो कुछ अच्छा ही होगा,

पर मन में सब सोच रहे थे

लो खत्म हुआ एक और सिलसिला

जाने कब नया शुरू होगा

जाने कब नया शुरू होगा…….

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