Tuesday, October 5, 2010

ख्वाब टूटा ऐसा कि …..

 

चांदनी उस रात में

जब बहारें झूम रही थी

एक पल में अचानक

चाँद कहीं खो गया

और अमावस सी स्याह हुई थी

वो रात, जब चाँद भी था सो गया

 

हुई रात वो काली इतनी

हाथ को हाथ ढूँढता रहा

रास्ते वहाँ थे भी या नहीं

नहीं किसी को पता लगा

 

सालों से सहेजे ख्वाब

बिखर गए जो ठोकर खाई

ख्वाब टूटा ऐसा कि

नींद रात भर ना आई

 

जानता हूँ मैं कि उस चाँदनी में भी

ना सपनो का महल कोई बना पाता

जानता हूँ साथ होते तुम तो भी

न कोई प्रेम गीत तुम्हे सुना पाता

पर साथ होते तुम

तो धडकनों का शोर भी

राग मधुर सा एक बन जाता

महल न होते साथ तो भी क्या है

साथ तुम्हारे जीवन ऐसे ही कट जाता

 

अब सोचते हैं

कैसे बीतेगा बाकी समय

और रीतेगी (रीतना = emptying) ये रात

कब होगी जाने सुबह

और होगी धूप की बरसात

6 comments:

  1. अब सोचते हैं

    कैसे बीतेगा बाकी समय

    और रीतेगी (रीतना = emptying) ये रात

    कब होगी जाने सुबह

    और होगी धूप की बरसात
    बहुत जल्द क्यों कि रात के बाद ही तो अंधेरा होता है। मन की कशमकश को अच्छे शब्द दिये हैं
    शुभकामनायें

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद निर्मला जी पर कभी रात इतनी लंबी हो जाती है कि सवेरा दूर दूर तक नहीं दिखाई देता.........

    ReplyDelete
  3. निडर हो सपने तू देखता चल... अपनी मंजिल की रह पर चला चल...
    रात का क्या है , वोह तो दिन के उजाले की परछाई है ..
    जो सपना तुमने बंद आखों से देखा वोह सच्चाई की परछाई है

    यह रात का अंधकार धोखा देता है,
    ज़रा मुड के तो देख ओ राही ..
    तेरा मौला तेरे साथ चला रहा है ..

    ReplyDelete
  4. awesome!!!
    हुई रात वो काली इतनी
    हाथ को हाथ ढूँढता रहा

    ReplyDelete