Monday, November 8, 2010

आधी रात की कविता (उत्तरार्ध)

(This is an extension of poem already posted here)

जब चाँद फलक पर आता है

और तारे गुनगुन करते हैं

जब बागों में जाकर भंवरे

कलियो से भुनभुन करते हैं

जब हवा भी शांत हो स्तब्ध कहीं रुक जाती है

और हल्की सी आहट भी चौकन्ना सा कर जाती है

जब मौहल्ले के चौकीदार की आवाज़ भी गुंजन लगती है

और दूर जाती रेल की छुकछुक भी मनोरंजन करती है

जब कुत्ते भी भौंकना बंद कर जाके कहीं सो जाते हैं

और चारो और खड़े अंधेरे आपस में बतियाते हैं

जब रात का सूनापन मन पर भी छा जाता है

और कर कर चाँद से बातें दिल भी थक जाता है

तब सोचता हूँ क्यूँ मैंने तुमको याद किया

बस एक पल सोचा तुम्हे और सारा दिन बर्बाद किया

शायद अधचेतना(subconsciousness) में ही पड़े रहने देता तुम्हे

तो रातों को बैठ बैठ, यूँ मदिरा न पिया करता मैं

 

याद में तेरी भूल गए हम, क्या अपने क्या बेगाने

पीते हैं आंसू या मदिरा, और भला हम क्या जाने

मन कि है ये कड़वाहट मेरी, या मदिरा का मीठापन

गंगाजल भी खारा लगता है, अब तो मदिरा के आगे

 

जिस दिन से तू छोड़ गई, और सपने लगे तेरे आने

साकी हमें देने लगी, बिना गिने, भर भर पैमाने

कुछ छलक गए, कुछ टूट गए, कुछ पी गए हम पैमाने,

पर ना समझ पाए अब तलक,

साकी ने भरे थे मदिरा से या तेरी याद से पैमाने

 

अब तो अनंत शून्य में देख देखकर, घुट घुट कर हम जीते हैं

कभी भुलाने को तुझको, कभी याद करने को पीते हैं

कविताएँ तुझ पर कर कर, मेरे शब्दकोष भी रीते हैं

अब मदिरा ही है प्रियतम मेरी, इसके लिए ही हम जीते हैं

इसके लिए ही हम जीते हैं

2 comments:

  1. "रिश्ते कोई कांच नहीं ,

    जो पल में टूट जायेंगे ,

    रिश्ते तो वह अहसास है ,

    जो जीवन भर साथ रह पाएंगे ,

    धीरे धीरे वक्त की आग में ,

    तप कुंदन ही होते जायेंगे ......!!"



    बहुत खूब ......

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