Saturday, December 25, 2010

दर्द तुझे भी होता होगा……

 

जब सूनी तन्हा रातों में

सब खाली खाली लगता होगा

बात किसी से करने को जब

पास न कोई होता होगा

याद तो मेरी आती होगी

दिल में टीस तो कोई उठती होगी

पत्थर दिल तो तू भी नहीं

दर्द तुझे भी होता होगा

 

राहों में देख कभी मुझे

तू भी घंटो सोचती होगी

तकिए में छुपा चेहरा अपना

तू भी घंटो रोती होगी

हो जाए सब पहले जैसा

एक आस तो मन में उठती होगी

चोट तो तूने भी खायी है

दर्द से तू भी रोती होगी

 

न शिकवे किए तूने कुछ

न कभी मेरे सुने

फिर क्यूँ बता तो एक बार

छोड़ तूने अपने, गैर चुने

कर याद उन बीतें लम्हों को

जेहन तेरा भी सिहर उठता है ना

एक बार बता दे, चाहे चुपके से

दर्द तुझे भी होता है ना

दर्द तुझे भी होता है ना

दर्द तुझे भी होता है ना

Sunday, December 12, 2010

तू भी तो कुछ बोल कभी…….

चूने सी, दीवारों से झड, हाथो में कभी आ लगी

बैठ सिरहाने तकिये के, तू रातों रातो संग जगी

और बैठ कभी घंटो ऐसे ही, बातें तूने मेरी सुनी

पर तन्हाई, तू भी तो कुछ बोल कभी, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

 

समझ न पाया साथ तेरा, खुदा कि रहमत है, रुसवाई है

एक तू ही सदा से संग रही, बाकी दुनिया हरजाई है

दुःख में साथ दिया था तूने, या तू उसकी ही परछाई है

कैसे समझूं री बता, तू कहाँ कभी बतलायी है

 

फिर भी दर्द मेरे बांटे तूने, जब भी कोई चोट लगी

एक मौका मुझको भी दे, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

ऐ तन्हाई कुछ बोल कभी, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी, क्यूँ हमेशा खामोश रही

 

Special thanks to Rans for the theme of the poem…..