Sunday, December 12, 2010

तू भी तो कुछ बोल कभी…….

चूने सी, दीवारों से झड, हाथो में कभी आ लगी

बैठ सिरहाने तकिये के, तू रातों रातो संग जगी

और बैठ कभी घंटो ऐसे ही, बातें तूने मेरी सुनी

पर तन्हाई, तू भी तो कुछ बोल कभी, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

 

समझ न पाया साथ तेरा, खुदा कि रहमत है, रुसवाई है

एक तू ही सदा से संग रही, बाकी दुनिया हरजाई है

दुःख में साथ दिया था तूने, या तू उसकी ही परछाई है

कैसे समझूं री बता, तू कहाँ कभी बतलायी है

 

फिर भी दर्द मेरे बांटे तूने, जब भी कोई चोट लगी

एक मौका मुझको भी दे, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

ऐ तन्हाई कुछ बोल कभी, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी, क्यूँ हमेशा खामोश रही

 

Special thanks to Rans for the theme of the poem…..

6 comments:

  1. ऐ तन्हाई कुछ बोल कभी, क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी

    क्यूँ ऐसे खामोश खड़ी, क्यूँ हमेशा खामोश रही...

    बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..बधाई .

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  2. ख़ामोशी भी बोलती है ....राज दिल के खोलती है .....
    बंद करके आँखे ....महसूस कर लो एक बार .....
    ख़ामोशी भी बोलती है ....राज दिल के खोलती है .....

    bhut pyari rechna.....

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