Saturday, August 6, 2011

तुम थोडा रुक पाते तो…….

 

इस राह कि ये बेबसी है यहाँ अकेले चलना पड़ता है

हमसफ़र कोई मिले तो भी अलविदा उसे कहना पड़ता है

हम थोडा और साथ चल पाते तो सोचो कितना अच्छा होता

तुम थोडा और रुक पाते तो सोचो कितना अच्छा होता

 

बस अभी तो अपनी बातों में गहराई सी कुछ आई थी

बस अभी तो तुम्हारी मुस्कान में मैंने हंसी अपनी पायी थी

बस अभी तो चलते चलते अपनी कुहनियाँ टकराईं थी

बस अभी तो मेरी हथेलियाँ तुम्हारी उंगलिया महसूस कर पायी थी 

हम थोडा और कम शरमा पाते तो सोचो कितना अच्छा होता

तुम थोडा और रुक पाते तो सोचो कितना अच्छा होता

 

कितनी बार ऐसा हुआ कि तुम बोले और में चुप रहा

कितनी बार ऐसा हुआ कि मेरे पास कुछ कहने को ना था

कितनी बार कितना कुछ था पर कुछ कह न सका

कितनी बार एक बेदर्द सा वाकिया, गले में आके रुक गया

हम अगर हमदर्द बन पाते तो सोचो कितना अच्छा होता

तुम थोडा और रुक पाते तो सोचो कितना अच्छा होता

4 comments:

  1. काश कुछ और लोग हमदर्द बन जाते तो कितना अच्छा ...

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  2. bro intzar hai... kuchh arz karo

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  3. Eisi baat....abhi lijie...jald se jald....

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