Tuesday, January 24, 2012

एक पल जो ठहरो तुम तो….

 

आती है जो दिल से आवाज़

उसे हम अनसुना सा क्यूँ करते हैं

रुकने को चाहते पर चलूँ चलूँ करते हैं

इस पल की तो सुन लो आवाज़ कि कहीं वक्त रुसवां ना हो जाए

एक पल तो ठहरो कम से कम, ये पल खुशनुमां सा हो जाए

 

किस्से सुना रहे हैं तब से, फिल्मों के, अख़बारों के

अफ़साने से कुछ सुना रहे हैं, हम बीती यादों से

कुछ बातें तो कही सुनी हैं, पर कुछ नयी नवेली हैं

कुछ बातें तो पूरी हो गयी पर कुछ अब भी अधूरी हैं

थोडा वक्त और दो,  तो शायद एक बात और पूरी हो जाए

एक पल और थोडा ठहरो तो ये पल खुशनुमा हो जाए

 

सपने जो तब से देख रहे हैं, हम भटकते बंजारों से

कब से जैसे भाग रहे हैं हम, हकीकत के पहरेदारों से

कुछ सपने जैसे पकड़ लिए हों, किसी कड़वी सच्चाई ने

कुछ अभी भी बचे हुए हैं, पूरे होने की ख्वाहिश में

कुछ देर और साथ दो तो शायद कोई सपना मंजिल पा जाए

एक पल जो तुम ठहरो तो, ये पल खुशनुमा हो जाए…..