Thursday, January 3, 2013

अधूरी रात

उसकी उँगलियों में उँगलियाँ डाले

सर से उसके सर को सटाए

बिन बोले पर होठों से ही

एक बात कही थी

वो बात कहीं तो रुक गयी

हमारी हया के सामने झुक गयी

वो बात अधूरी रह गयी

उस रात अधूरी रह गयी

 

रात जो लंबी लग रही थी

बंद आँखों में भी जग रही थी

वो रात सहर के आने से जैसे डर गयी

खत्म होने से पहले ही वो चुप से दिल में भर गयी

सहर का डर खत्म हो तो

वो रात फिर से बाहर निकाली जाए

ना करके परवाह किसी की

वो रात तो पूरी जी ली जाए

फिर बात वो पूरी कर ली जाए

जो बात अधूरी रह गयी

उस रात अधूरी रह गयी

 

 

क्यूँ होता एक बात बता

दिल अपना इतना परेशां हैं

कोई न कोई बंदिश सी वो

अपनी बातों में लाता हमेशा है

एक को तोडो दूजी तैयार खड़ी

होठो को भी बांधे देती हैं

तेरे मेरे कहने से पहले ही

वो बात हमारी पी लेती है

एक बार तो कोशिश करके

इन सबसे दूर जाया जाए

बिना उनके सुने ही

अपनी बात को पूरा किया जाए

वो बात जो कबसे अधूरी है

वो बात जो करनी पूरी है